। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार मार्च से जुलाई 2026 के बीच करीब 1.95 लाख ऐसे निर्देश दिए गए, औसतन लगभग 1,275 प्रतिदिन यानी करीब हर 68 सेकंड में एक directive।
5 महीने में 1.95 लाख सोशल मीडिया कंटेंट पर कार्रवाई! क्या बढ़ रहा है डिजिटल सेंसरशिप का दायरा?
भारत में सोशल मीडिया पर सरकारी निगरानी और ऑनलाइन कंटेंट हटाने की व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, मार्च से जुलाई 2026 के बीच केंद्र सरकार की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को करीब 1.95 लाख blocking या takedown directives भेजे गए। इनमें Instagram, Facebook और YouTube जैसे बड़े प्लेटफॉर्म शामिल रहे। यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पांच महीने की अवधि में औसतन करीब 1,275 निर्देश रोजाना भेजे गए—यानी लगभग हर 68 सेकंड में एक निर्देश।
1.95 लाख निर्देशों ने क्यों खींचा ध्यान?
सरकार के पास गैरकानूनी या नियमों का उल्लंघन करने वाले ऑनलाइन कंटेंट पर कार्रवाई करने के लिए अलग-अलग कानूनी प्रावधान और व्यवस्थाएं हैं। इनमें Sahyog Portal भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पोर्टल सरकारी एजेंसियों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के बीच कंटेंट हटाने या उस तक पहुंच सीमित करने से जुड़े अनुरोधों को भेजने की व्यवस्था उपलब्ध कराता है।
लेकिन हाल में सामने आए आंकड़ों ने इस व्यवस्था के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर बहस तेज कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक मार्च से जुलाई के दौरान भेजे गए निर्देशों की संख्या पिछले कुछ वर्षों की तुलना में काफी अधिक रही। खासकर Instagram को बड़ी संख्या में directives भेजे गए।
Instagram सबसे ज्यादा प्रभावित प्लेटफॉर्म में शामिल
रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में Instagram को लगभग एक लाख directives मिले, जबकि Facebook और YouTube को भी बड़ी संख्या में निर्देश भेजे गए। Instagram पर कार्रवाई का बढ़ना विशेष रूप से चर्चा में रहा क्योंकि 2026 के दौरान छात्र प्रदर्शनों और अन्य सार्वजनिक आंदोलनों से जुड़े कंटेंट का प्रसार इसी प्लेटफॉर्म पर काफी हुआ।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि हर blocking directive का मतलब यह नहीं है कि सरकार ने किसी व्यक्ति को सीधे दंडित किया। कई मामलों में किसी खास URL, पोस्ट या ऑनलाइन सामग्री तक पहुंच रोकने अथवा उसे हटाने का निर्देश प्लेटफॉर्म को दिया जाता है।
Sahyog Portal क्या है?
Sahyog Portal को सरकारी एजेंसियों और internet intermediaries के बीच coordination के लिए विकसित किया गया है। इसके माध्यम से अधिक व्यवस्थित तरीके से online content से संबंधित notices और requests भेजे जा सकते हैं।
मार्च 2026 में संसद की एक समिति की रिपोर्ट में भी Sahyog Portal के जरिए ऑनलाइन कंटेंट हटाने की प्रक्रिया और उससे जुड़े आंकड़ों का उल्लेख किया गया था। उस रिपोर्ट के अनुसार, पोर्टल के जरिए बड़ी संख्या में URLs और unlawful content से संबंधित requests intermediaries को भेजे गए थे।
यानी Sahyog Portal कोई सामान्य social-media platform नहीं है, बल्कि सरकारी एजेंसियों और digital intermediaries के बीच कार्रवाई से जुड़ी communication व्यवस्था है।
सरकार की तरफ से सुरक्षा का तर्क
ऑनलाइन कंटेंट को हटाने की व्यवस्था का एक प्रमुख उद्देश्य illegal content, cybercrime, misinformation, harmful material और कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं पर कार्रवाई करना है। इंटरनेट पर फर्जी खबरों, धोखाधड़ी और आपत्तिजनक सामग्री के बढ़ते प्रसार के बीच सरकार के लिए तेजी से कार्रवाई करना एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है।
सरकार और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों का दृष्टिकोण यह है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कानून का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है। अगर कोई सामग्री कानून का उल्लंघन करती है या सार्वजनिक सुरक्षा के लिए गंभीर समस्या पैदा करती है, तो उसे हटाने की प्रक्रिया आवश्यक हो सकती है।
लेकिन Free Speech को लेकर सवाल भी
दूसरी तरफ, इतने बड़े पैमाने पर takedown directives सामने आने के बाद freedom of expression को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। आलोचकों की चिंता है कि अगर online content को हटाने की प्रक्रिया में पर्याप्त transparency, notice और independent safeguards नहीं हों, तो legitimate criticism या public-interest content भी प्रभावित हो सकता है।
इसी मुद्दे को लेकर Sahyog Portal और online content blocking powers को अदालतों में चुनौती भी दी गई है। Bombay High Court में ऐसी याचिकाएं दाखिल हुई हैं जिनमें portal और संबंधित IT Rules की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। अगस्त 2026 में Supreme Court ने इस विवाद से संबंधित कुछ High Court proceedings पर stay भी दिया था।
इससे साफ है कि मामला सिर्फ social media moderation तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कानून, डिजिटल सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तीनों पहलू जुड़े हुए हैं।
क्या इसे डिजिटल सेंसरशिप कहना सही है?
यहां शब्दों का इस्तेमाल सावधानी से करना जरूरी है। 1.95 लाख directives का आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सभी मामलों में सरकार ने राजनीतिक या आलोचनात्मक विचारों को सेंसर किया। सरकारी निर्देशों में illegal content और दूसरे कानूनी उल्लंघनों से संबंधित मामले भी शामिल हो सकते हैं।
वहीं, इतनी बड़ी संख्या में takedown directives होने के कारण यह सवाल जरूर महत्वपूर्ण हो जाता है कि इन फैसलों की प्रक्रिया कितनी transparent है और users को गलत या अनुचित removal के खिलाफ किस तरह की remedy मिलती है।
इसलिए पूरे मुद्दे को केवल “सरकार बनाम सोशल मीडिया” के रूप में देखना सही नहीं होगा। असली सवाल यह है कि online safety और individual freedom के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
सोशल मीडिया कंपनियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
इस पूरी व्यवस्था में Meta, Google और अन्य digital platforms की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सरकार की ओर से भेजे गए notices के बाद platforms को अपने कानूनी दायित्वों और internal policies के अनुसार कार्रवाई करनी पड़ती है।
कंटेंट moderation में speed जरूरी है, लेकिन accuracy भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अगर कोई automated system या तेजी से लागू होने वाली प्रक्रिया किसी गलत content को हटा देती है, तो user के लिए appeal और review की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।
इसीलिए आने वाले समय में transparency reports, government requests की जानकारी और content removal के खिलाफ appeal mechanisms पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकता है।
भारत के डिजिटल भविष्य के लिए बड़ा सवाल
भारत में इंटरनेट users और social-media users की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में online platforms केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गए हैं। लोग news, education, business, politics, public discussions और personal communication के लिए भी इनका इस्तेमाल करते हैं।
इसलिए digital governance का प्रभाव करोड़ों users तक पहुंचता है। सरकार के लिए cybercrime और illegal content से मुकाबला करना जरूरी है, लेकिन साथ ही legitimate expression और public debate की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है।
1.95 लाख directives का आंकड़ा इसी बड़े सवाल को सामने लाता है—डिजिटल दुनिया को सुरक्षित बनाते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा कहां तय की जाए?
निष्कर्ष
मार्च से जुलाई 2026 के बीच करीब 1.95 लाख social-media blocking/takedown directives का सामने आना भारत की digital governance व्यवस्था के बढ़ते पैमाने को दिखाता है। औसतन करीब 1,275 directives प्रतिदिन का आंकड़ा निश्चित रूप से बड़ा है।
सरकार के लिए illegal content और cyber threats पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन users के अधिकार, transparency और उचित review process भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। आने वाले समय में अदालतों के फैसले और सरकार की digital-content policies यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि भारत में online safety और freedom of expression के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाता है।
writter Newsgali
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